Sunday, August 30, 2015

मुक्तक ......मंजरी

देखें बंधुवर कुछ चिंतन.... मुक्तक के रुप में...........
1--
जिस उम्र में बचपन की कलियाँ,मदमस्त चमन में खिलती हैं |
नयनो में..सपन सजा करके..नित ..आशाओं में ...पलतीं हैं |
उस उम्र में बचपन..सड़कों पर,जब पेट के खातिर तपता हो,
उस देश की किस्मत पर खुशियाँ,बस दूर खड़ी हो हंसती हैं |
                   
2--
भाव भूषित रहें.....भावना के सुमन |
शुचि समर्पित करें..साधना के सुमन |
उर बिहारो..बिहारी..विनय मान लो,
लालसा में हैं..ये..  कामना के सुमन |
             

3--
स्वार्थ सृजित सदभाव हुये  अब रिश्ते  कच्चे धागों  के |
अर्ध हीन.. से भाव हुये  अब रिश्ते कच्चे धागों के |
रिश्तों का..मधुमास..कभी था बंधन कच्चे धागों का,
किन्तु सभी  को घाव हुये  अब रिश्ते कच्चे धागों के |
                            
4--
मान करि..मानस को..मानस में..सजाइये |
तुलसी को..ईश मान.. शीश नित.. नवाइये |
भारती..निहारती..पुकारती ओ..मातृशक्ति ,
हुलसी के.. तुलसी सो. .एक सुत...जाइये |

5--
जिस उम्र में बचपन की कलियाँ,मदमस्त चमन में खिलती हैं |
नयनो में..सपन सजा करके..नित ..आशाओं में ...पलतीं हैं |
उस उम्र में बचपन..सड़कों पर,जब पेट के खातिर तपता हो,
उस देश की किस्मत पर खुशियाँ,बस दूर खड़ी हो हंसती हैं |             

6---
स्वर की... देवी शारदे...वन्दन है...शत् बार |
बार-बार प्रनवउँ तुम्है .मातु करो स्वीकार |
स्वीकारो जगदम्बिके . चरण. शरण में लेय,
लेय आपकी..अम्बिके..टेक.. सकल संसार |
                        
7--
जानती हूँ..फिर न कोई..घाव सिलने आयेगा |
किन्तु मेरा हौसला..किंचित न..हिलने पायेगा |
मैं.. लगा लूंगी.. हिना.. तेरे.. शहीदी खून से  ,
जब तिरंगे में सजा..तू..मुझसे मिलने आयेगा |
                               
9--
आँखों में हया के संग..ना भाव दुरंगा हो |
तन वस्त्र हीन हो पर..ीआभाव न नंगा हो |…
सकंल्प लक्ष्य का हो..अवरोध न पथ रोके,
शाश्वत  इस धरती पर...गंगा व तिरंगा हो |

10---
सत्ता की हर इक सीढ़ी का , अब अंदाज निराला है |
लोकतंत्र की दूषित गरिमा , करता आज घोटाला है |
गिद्धों की बैठी जमात सब , राज तंत्र के उपवन में |
लूट-लूट का खेल चल रहा , शामिल हर रखवाला है |
                        
11--
वेद, पुराणों की गरिमाओं का अभिनंदन |
भारत की गौरव गाथाओं का अभिनंदन |
जिन पृष्ठों पर बलिदानी इतिहास लिखा है,
पृष्ठ सृजक उन प्रतिभाओं  का अभिनंदन! |
 
12---
शब्द का...भावार्थ यदि...रोटी..बने तो..बात हो |
टिमटाती... आँख मेें... ज्योती.. बने तो..बात हो |
राष्ट्र हित सीमा पे सावन..जिस बहन का हो लुटा ,
उस बहन की..माँग का... मोती..बने..तो बात हो |
                               
13---
लहू शावकों का.. जब .. जिंदाबाद हुआ |
लोकतंत्र का.. सूरज तब.. आजाद हुआ |
पर क्या पाया..आजादी से..भारत माँ ने,
काले अंग्रेजों का ....घर ..आबाद हुआ ||
               
14----
शब्द का...भावार्थ यदि...रोटी..बने तो..बात हो |
टिमटाती... आँख मेें... ज्योती.. बने तो..बात हो |
राष्ट्र हित सीमा पे सावन..जिस बहन का हो लुटा ,
उस बहन की..माँग का... मोती..बने..तो बात हो |
                             
15---
स्वाभिमानी से कभी...अभिमान हिल सकता नहीं |
शक्ति से हरगिज़ कभी..सम्मान मिल सकता नहीं |
भक्ति से भगवान का..मिलना भले मुश्किल न हो,,
किन्तु खादी में  कभी. .. ईमान मिल सकता नहीं |
                       
€€€€€€€ गीत €€€€€€€

प्रीति..ही..प्रतिकार न दे , मैं ..बताओ.. क्या करुं |
प्यार का अधिकार न दे , मैं ..बताओ ...क्या करुं |
तन का पिंजरा तोड़..पंक्षी..प्राण का..जब उड़ चला,
तब..कोई..आवाज दे.. तो , मैं.. बताओ.. क्या कर

ज्यों.. कली चटकी..कि भौंरे.. झूम कर..गाने लगे |
और कली..को भी..भ्रमर के..गीत..तब भाने लगे |
रुप, रस, मधु.. लूट कर, कलियों को..भौंरे रौंद दे ,
फिर बहारें... लाख आयें..... मैं बताओ क्यों करुँ |
तन का पिंजरा............................................. ,,
तब कोई आवाज दे तो....................................|

माँझियों.. के.. हांथ जब...पतवार... बहकानें लगे |
बागवाँ.. कर साजिशें.. जब.. खार.. महकानें लगे |
घर के दीपों से ही घर में.. आग भी लग जाये जब,,
तब भी..आँखें..खुल न पायें..मैं बताओ क्या करुँ |
तन का पिंजरा.............................................. ,,
तब कोई आवाज दे तो................................... |

सत्य से.. नजरें.. चुराई हैं.. सुखों..... की.. चाह में |
कर लिये... साकार.. सपने... दीनता की.. आह में |
किन्तु..नयनों में..ललक..रह जाये..सुख के भोग की,,
जिंदगी... अभिसार... न ..दे... मैं बताओ क्या करुँ |
तन का पिंजरा................................................ ,,
तब कोई आवाज दे तो..................................... |

जिंदगी.. में.. प्यार की.. कीमत.. लगाई.. जा रही |
आवरण.. की..ओट में..सूरत.. छिपायी..जा रही |
टोलियां..विषदंत की..चंदन.. पे लिपटे..लाख पर,,
वो हलाहल तज न पायें... मैं बताओ क्या करुँ |
                             (अनुपम आलोक )