Sunday, August 30, 2015

मुक्तक ......मंजरी

देखें बंधुवर कुछ चिंतन.... मुक्तक के रुप में...........
1--
जिस उम्र में बचपन की कलियाँ,मदमस्त चमन में खिलती हैं |
नयनो में..सपन सजा करके..नित ..आशाओं में ...पलतीं हैं |
उस उम्र में बचपन..सड़कों पर,जब पेट के खातिर तपता हो,
उस देश की किस्मत पर खुशियाँ,बस दूर खड़ी हो हंसती हैं |
                   
2--
भाव भूषित रहें.....भावना के सुमन |
शुचि समर्पित करें..साधना के सुमन |
उर बिहारो..बिहारी..विनय मान लो,
लालसा में हैं..ये..  कामना के सुमन |
             

3--
स्वार्थ सृजित सदभाव हुये  अब रिश्ते  कच्चे धागों  के |
अर्ध हीन.. से भाव हुये  अब रिश्ते कच्चे धागों के |
रिश्तों का..मधुमास..कभी था बंधन कच्चे धागों का,
किन्तु सभी  को घाव हुये  अब रिश्ते कच्चे धागों के |
                            
4--
मान करि..मानस को..मानस में..सजाइये |
तुलसी को..ईश मान.. शीश नित.. नवाइये |
भारती..निहारती..पुकारती ओ..मातृशक्ति ,
हुलसी के.. तुलसी सो. .एक सुत...जाइये |

5--
जिस उम्र में बचपन की कलियाँ,मदमस्त चमन में खिलती हैं |
नयनो में..सपन सजा करके..नित ..आशाओं में ...पलतीं हैं |
उस उम्र में बचपन..सड़कों पर,जब पेट के खातिर तपता हो,
उस देश की किस्मत पर खुशियाँ,बस दूर खड़ी हो हंसती हैं |             

6---
स्वर की... देवी शारदे...वन्दन है...शत् बार |
बार-बार प्रनवउँ तुम्है .मातु करो स्वीकार |
स्वीकारो जगदम्बिके . चरण. शरण में लेय,
लेय आपकी..अम्बिके..टेक.. सकल संसार |
                        
7--
जानती हूँ..फिर न कोई..घाव सिलने आयेगा |
किन्तु मेरा हौसला..किंचित न..हिलने पायेगा |
मैं.. लगा लूंगी.. हिना.. तेरे.. शहीदी खून से  ,
जब तिरंगे में सजा..तू..मुझसे मिलने आयेगा |
                               
9--
आँखों में हया के संग..ना भाव दुरंगा हो |
तन वस्त्र हीन हो पर..ीआभाव न नंगा हो |…
सकंल्प लक्ष्य का हो..अवरोध न पथ रोके,
शाश्वत  इस धरती पर...गंगा व तिरंगा हो |

10---
सत्ता की हर इक सीढ़ी का , अब अंदाज निराला है |
लोकतंत्र की दूषित गरिमा , करता आज घोटाला है |
गिद्धों की बैठी जमात सब , राज तंत्र के उपवन में |
लूट-लूट का खेल चल रहा , शामिल हर रखवाला है |
                        
11--
वेद, पुराणों की गरिमाओं का अभिनंदन |
भारत की गौरव गाथाओं का अभिनंदन |
जिन पृष्ठों पर बलिदानी इतिहास लिखा है,
पृष्ठ सृजक उन प्रतिभाओं  का अभिनंदन! |
 
12---
शब्द का...भावार्थ यदि...रोटी..बने तो..बात हो |
टिमटाती... आँख मेें... ज्योती.. बने तो..बात हो |
राष्ट्र हित सीमा पे सावन..जिस बहन का हो लुटा ,
उस बहन की..माँग का... मोती..बने..तो बात हो |
                               
13---
लहू शावकों का.. जब .. जिंदाबाद हुआ |
लोकतंत्र का.. सूरज तब.. आजाद हुआ |
पर क्या पाया..आजादी से..भारत माँ ने,
काले अंग्रेजों का ....घर ..आबाद हुआ ||
               
14----
शब्द का...भावार्थ यदि...रोटी..बने तो..बात हो |
टिमटाती... आँख मेें... ज्योती.. बने तो..बात हो |
राष्ट्र हित सीमा पे सावन..जिस बहन का हो लुटा ,
उस बहन की..माँग का... मोती..बने..तो बात हो |
                             
15---
स्वाभिमानी से कभी...अभिमान हिल सकता नहीं |
शक्ति से हरगिज़ कभी..सम्मान मिल सकता नहीं |
भक्ति से भगवान का..मिलना भले मुश्किल न हो,,
किन्तु खादी में  कभी. .. ईमान मिल सकता नहीं |
                       
€€€€€€€ गीत €€€€€€€

प्रीति..ही..प्रतिकार न दे , मैं ..बताओ.. क्या करुं |
प्यार का अधिकार न दे , मैं ..बताओ ...क्या करुं |
तन का पिंजरा तोड़..पंक्षी..प्राण का..जब उड़ चला,
तब..कोई..आवाज दे.. तो , मैं.. बताओ.. क्या कर

ज्यों.. कली चटकी..कि भौंरे.. झूम कर..गाने लगे |
और कली..को भी..भ्रमर के..गीत..तब भाने लगे |
रुप, रस, मधु.. लूट कर, कलियों को..भौंरे रौंद दे ,
फिर बहारें... लाख आयें..... मैं बताओ क्यों करुँ |
तन का पिंजरा............................................. ,,
तब कोई आवाज दे तो....................................|

माँझियों.. के.. हांथ जब...पतवार... बहकानें लगे |
बागवाँ.. कर साजिशें.. जब.. खार.. महकानें लगे |
घर के दीपों से ही घर में.. आग भी लग जाये जब,,
तब भी..आँखें..खुल न पायें..मैं बताओ क्या करुँ |
तन का पिंजरा.............................................. ,,
तब कोई आवाज दे तो................................... |

सत्य से.. नजरें.. चुराई हैं.. सुखों..... की.. चाह में |
कर लिये... साकार.. सपने... दीनता की.. आह में |
किन्तु..नयनों में..ललक..रह जाये..सुख के भोग की,,
जिंदगी... अभिसार... न ..दे... मैं बताओ क्या करुँ |
तन का पिंजरा................................................ ,,
तब कोई आवाज दे तो..................................... |

जिंदगी.. में.. प्यार की.. कीमत.. लगाई.. जा रही |
आवरण.. की..ओट में..सूरत.. छिपायी..जा रही |
टोलियां..विषदंत की..चंदन.. पे लिपटे..लाख पर,,
वो हलाहल तज न पायें... मैं बताओ क्या करुँ |
                             (अनुपम आलोक )

श्रावण मास 2015 भगवान महाकाल अर्चन


1----
जय सोमनाथ..मल्लिकार्जुन..जय महाकाल प्रभु अविनाशी |
ओंकारेश्वर.. जै... ममलेश्वर..जय बैद्यनाथ... प्रभु कैलाशी |
भीमा शंकर...जय रामेश्वर...जय नागेश्वर.. जय विश्वनाथ,
त्रयम्बकेश्वरम्.. केदार नाथ.. जय घूष्मेंश्वर प्रभु सुखराशी |
यह द्वादश ज्योतिर्मय स्वरुप ...शिवशंकर अवडरदानी के |
सुमिरन से भव भय फंद कटें.. इस मृत्यु लोक में प्राणीं के |
                                             
2---
नमो नीलकंठम्,,त्रिनेत्रम्..पुरारी |
गंगा धरम्,,शिव..महेन्द्रम् मुरारी |
महाकाल,,शशिशेखरम्..हे दयालू,
चरण की शरण में..रहूँ उम्र सारी |

3---
शशि-सूर्य मुदित अंतस चंदन |
संध्या सुरम्य.. ,नैसर्गिक तन |
लख नयन..मुदित हो जाते तब,
धरती अंबर की.. अमर छुअन |
            
4---
हे दुख हर्ता...मंगल कर्ता....जग के पालन हार |
पत राखौ....मेरी त्रिपुरारी...बरधा के असवार |
चरण वन्दना करुं नाथ मैं,काल गति के स्वामी,
गणपति के पितु..महाकाल हे.. गौरी के भरतार |
                             
4---
जटं शोभि गंगम्..भुजगेन्द्र हाराय |
ऱभे भस्म अंगम्... शशि शेखराय |
शुाभम् नीलकंठम्..त्रिनेत्रम् मुरारी,
महाकाल प्रनवउँ..ज्योतिर्स्वरुपाय |
            
5---
जय करुणाकरअवडरदानी,त्रिभुवन पति,त्रिपुरारी |
जय डमरु धर, पार्वती पति, जय शमशान बिहारी |
हे नागेश्वर, महाकाल प्रभु, अरज..मेरी सुन लीजै,
शरणागत हो..दीन-हीन मैं..आया शरण तिहारी |

6---
शीश पर...प्रभु...चंद्र -गंगा..को बिठाया आपने |
कंठ पर....विष दंत ..टोली..को सजाया आपने |

शक्ति ही शिव..शिव ही शक्ती,यह बलाने के लिये ,
अर्धनारीश्वर… स्वयं को „„था.. बनाया आपने |
                                         
कटि कसी..मृग चर्म,,तन पर..भस्म का श्रंगार कर,,
हिम शिखर..कैलाश पर,, आसन.. जमाया आपने |

कर में डमरु..बैठ नंदी,, शक्ति को..निज साथ ले,,
वेष..अवडर.. दानियों का,, है... बनाया आपने |

भूतभावन, पतित पावन, काल.. हू.. के काल प्रभु,,
सृष्ठि की..हर सांस में,, खुद को.. समाया आपने |

पार भव से..हो गया,,सातो सुखों को..भोग कर,,
ले शरण..जिस भक्त को,, अपना.. बनाया आपने |
                               

7---
शशि-शीश पै उतंग,,कंठ घेरे हैं भुजंग,,भस्म रमी अंग -अंग.. भंग पिये जो मलंग है |
लिये भूत-प्रेत संग,, चढि नंदी जी के अंग,,आदि शक्ति है बामंग,,रंगे भक्तन के रंग हैं |
काल.. हू.. के काल, महाकाल विकराल,, कटि कसे मृग छाल,, भाल फूटि रही गंग है |
पद पंकज निहोर,, माँगउं दोनो कर जोरि,, महाकाल प्रभु मोरि..साघौ ,,जीवन पतंग है |
                           

8--
शशि..गंग शीशम्.. कंठम् भुजंगम्....!
रमै भस्म अंगम्,, विलक्षण त्रिनेत्रम्...!
नमो नीलकंठम्,,,,,साष्टांग शरणम्... !
उज्जैन शोभित. , महाकाल चरणम्..!

9--
यह शिव शंकर अवडर दानी,,महाकाल अविनाशी |
उज्जैनी में ...आय विराजे ,,,,,कैलाशी ...के वासी |
चरण..शरण गह महाकाल की ,शीश नवाओ भक्तो,
भस्म आरती के यह दर्शन ,नयनाभिराम, सुखराशी |
                
10--
शशि..गंग शीशम्.. कंठम् भुजंगम्....!
रमै भस्म अंगम्,, विलक्षण त्रिनेत्रम्...!
नमो नीलकंठम्,,,,,साष्टांग शरणम्... !
उज्जैन शोभित. , महाकाल चरणम्..!
                         
11---
भंग की तरंग में विहंग अंग-अंग हुआ..
रंग चढ़ा सावन की मस्त सी फुहारों का |
दर्शी त्रिकाल, महाकाल, विकराल, भाल..
रुप में रंगोली छजी मुक्त मन विकारो का |
देवाधि देव, महादेव, सत्यमेव, लेव...
दास का प्रणाम, अविराम मनुहारो का |
काम,क्रोध,मद,मोह,लोभ कर क्षार प्रभु,
मन में प्रवाह भरो "अनुपम" विचारों का |
                              (अनुपम आलोक )

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Tuesday, July 14, 2015

मेरे हिंदुस्तां को ......एक सैनिक की चिट्ठी भारत के प्रधान सेवक के नाम......! चाहें जैसी...लाचारी हो....चाहें जैसी....मजबूरी हो , लेकिन अब केसर क्यारी का सम्मान नहीं घटने देंगे | सम्पूर्ण राष्ट्र की रक्षा में बट जाये भले तन टुकड़ों में, पर भारत माँ के आँचल को अब और नहीं बटने देंगे | लिपट तिरंगे में कब तक, हम अपने घर को जायेंगे | इंद्रप्रस्थ की नाकामी को कब तक यहाँ गिनायेंगे | जेहादी..सैनिक के मुख पर, मार तमाचा....... जिंदा हैं | राजभवन लाचार भले हो , लेकिन हम .....शर्मिंदा हैं | रणभेरी का शँखनाद ही , सारे कलुष ...मिटायेगा | केवल निंदा से मोदी जी , दाग नहीं ...धुल पायेगा | बेशक जनमत साथ तुम्हारे , रोज इबादत ....लिखते हो | पर सुकमा और कुपवाड़ा पर, हमें शिखंडी ........लगते हो | याचक बन कश्मीर मांग कर, मत माँ का .....अपमान करो | या तो .......छोड़ो काश्मीर या, गांडीव ...........संधान करो | हम गद्दारों के पत्थर से, मजबूर नहीं हो सकते है | हम काश्मीर की घाटी से, अब दूर नहीं हो सकते हैं | हम सबको बंधन मुक्त करो, सब आर पार कर लेने दो | दोगले और .....गद्दारों की , खालों में,भुस भर लेने दो | माओवादी, नक्सलवादी, दुनिया के ..सारे जेहादी | माँगेगे मौत स्वयं तुमसे , बस दे दो प्यारे आजादी | कहते हो जिसे पड़ोसी तुम, भाई कहकर समझाते हो | लेकिन यह कड़वा सत्य सही, सांपो को ....दूध पिलाते हो | अपनी सेना के वीरों का अब, और न तुम ....अपमान करो | अंतिम दुश्मन तक लड़ने का, बस जारी अब फरमान करो | इन केचुओं की कंपोस्ट बना. सीमा पर हमें ...छिड़कने दो | लाहौर, कंराची के.. सिर पर, बिजली बन हमें कड़कने दो | आतंकवाद का .. सारा विष , इनके तालू ........से खींचेगे | भारत माता के .... केशों को, इनके रुधिरों से .......सींचेगे | फिर आर्यावृत की सीमा में, दोगला ईमान ...नहीं होगा | राणांप्रताप की ...धरती पर, अब ..पाकिस्तान नहीं होगा | बस मेरा .....यही...निवेदन है, अंतिम निर्णय अब कर डालो | आजादी ..दे दो .......सेना को, तुम दिल्ली को... देखो-भालो | (अनुपम आलोक)

मापनी १२२२ १२२२ १२२२ १२२२ है

मो'हब्बत के सफर में फिर चलो कुछ अनसुनी कर दे |
करें विश्वास …साथी पर , हृदय …संजीवनी …कर दे |
सिसकता है...अमावस में.. . दिवाना कौन तन्हा सा ,
जला कर प्रेम का दीपक..चलो कुछ रोशनी कर दें |
चले यह सिलसिला यूं ही..मो'हब्बत की इबादत से...
न शिकवे हों..किसी को भी, जुबांने चासनी कर दें |
न लूटे अब सपन कोई..  न हो इंसानियत रूसवा...,
जहाँ में..नेकियों की हर जगह फिर चाँदनी कर दे |
खुदा से मांगता हूँ मै..झुका नफरत के' परचम को...
मेरे हिदुस्तां को फिर **मुकद्दस सरजमीं कर दे |
                                     (अनुपम आलोक )







Thursday, July 9, 2015

बेटियां ........संसोधित.... रचना माँ मुझे भी प्यार दो... <<<><><><><><><> माँ मुझे भी प्यार दो...! माँ मुझे भी प्यार दो...! मैं अजन्मीं....कोख तेरी....है...मेरा संसार माँ..! आवरण तन आपका..तेरा.रक्त ही आहार माँ..! हूँ भले मैं..सृष्ठि प्रभु की..पर तेरा अधिकार हूँ..! मैं सृजन हूँ..आपका...माँ..आपका संसार हूँ...! हे जननि जन कर मुझे तुम,इक नया संसार दो | माँ..मुझे भी प्यार दो..! माँ मुझे भी प्यार दो...! त्याग तेरा..तन में मेरे..अब..धड़कने भी लगा है | संस्कारों..की सुरभि से..मन महकने भी लगा है | आपके..बलिदान को माँ..चिंतनों में..भर पढूंगी | आपके सम्मान हित माँ..सच कहूँ युग से लड़ूंगी | जग के..झूंठे दंभ में आ..माँ..न मुझको मार दो | माँ मुझे भी प्यार दो...!. माँ मुझे भी प्यार दो ...! माँ तेरी जननी ने भी तो..एक दिन..तुमको जना था | तब सृजन के रीति पथ पर पितु तुम्हारा वर बना था | फिर..युगल स्पंदनों से..सृजन की..परणीति महकी | माँ ..तुम्हें भी ..माँ बनाने ...कोख में ..तेरे मैं चहकी | इस सृजन के..रीतिपथ का..बस मुझे अधिकार दो | माँ मुझे भी प्यार दो...! माँ मुझे भी प्यार दो ...! क्या रहोगी खुश..सृजन..अपना स्वयं ही हार कर | शक्ति पूजित..इस धरा पर....शक्ति का संहार कर | अहं के कुंठित पथों पर..मत करो बलिदान ममता | सृष्ठि के..उपहार में है ....दंभ की..प्रतिमान समता | माँ का गौरव..हो कलंकित..खुद न खुदको हार दो | माँ मुझे भी प्यार दो...! माँ मुझे भी प्यार दो...! ( अनुपम आलोक )

जिंदगी में ..आचरण का ,व्याकरण हैं बेटियाँ |
दो कुलों की तरणि-तारण, आवरण हैं बेटियाँ |
सम्पदा.. सब बांटते सुत,बेटियाँ ..दुख बांटती ,
है यही कारण ..धरा का ,जागरण.. हैं बेटियाँ |

बन के गौरव सदन बढ़ रहीं बेटियाँ |
ज्ञान धन में मगन  पढ़ रहीं बेटियाँ |
पंख के बल..बिहंगो ने अंबर छुआ,
पंख के बिन गगन चढ़ रहीं बेटियाँ |
                       (अनुपम आलोक )

                                (अनुपम आलोक )

अमृत समझ विष पिये जा रहे हैं .... (अनुपम आलोक )

भरम पर भरम सब दिये जा रहे है |
हया त्याग कर सब जिये जा रहे हैं |
हुय़े..चेतना शून्य..कितना प्रगति में,
अमृत समझ विष पिये जा रहे हैं |
                        (अनुपम आलोक )

Wednesday, July 8, 2015

वर्षा श्रृतु .....मेरी नजर से


धरा-मेघ..मिल..फूंक रहे स्वर, बरखा की ..शहनाई में |
फूट रही..कण-कण ..से मस्ती, नैसर्गिक ..अंगनाई में |
यौवन भार लदे कुंजन मा,दादुर,मोर,कोयलिया कुहकै,
ओढ़े धरती ..हरित चुनरिया , सावन ..की..पहुनाई में |
                                      (अनुपम आलोक )
चित्र मुक्तक...  56.......मुक्तक लोक

Monday, July 6, 2015

मित्रता ..... और ....मित्र

नमन बंधु वर.....
बंधु चिंतन..कसौटी, कसो स्वर्ण पा |
उर न उन्मुक्त हो, धर्म का..वर्ण का |
हैं जरुरी.. मनुज के लिये , मित्र दो,
एक हो कृष्ण सा,,,एक हो कर्ण सा |
                         "अनुपम आलोक "

Sunday, July 5, 2015

अपना चिंतन

मुक्तक मंच.... शीर्षक..... सफर
लक्ष्य खुद पास, आता नहीं दोस्तो |
पुष्प खुद पथ, सजाता नहीं दोस्तो |
जिंदगी का सफर है, सुहाना मगर,
साथ में कोई' जाता नहीं दोस्तो |
                     "  अनुपम आलोक "

बेटियों ने छुआ आसमान ......

शब्द मुक्तक -- 56
शीर्षक शब्द... पंक्षी,,,, पक्षी. आदि समनार्थी...
देश की प्रतिभावान बालिकाओं को समर्पित....!

बन के गौरव सदन बढ़ रहीं बेटियाँ |
ज्ञान धन में मगन  पढ़ रहीं बेटियाँ |
पंख के बल..बिहंगो ने अंबर छुआ,
बिन परों के गगन उड़ रहीं बेटियाँ |
                       (अनुपम आलोक )

Wednesday, July 1, 2015

वर्ण पिरामिड .

वर्ण पिरामिड सप्ताह - 9
शब्द - पात,,, पत्ते,,,, पल्लव... आदि...!
सप्ताहाध्यक्ष आदरणींया अनीता जैन जी को स.. सम्मान प्रेषित.....!
(1)

है
चाही
वृक्षों ने
मनुज से
मानवीयता
पल्लव..पल्लव
जीवन पथ पर..!

(2)

है
तन
एकाकी
तरुवर
रिश्ते हैं पात
जिनका पोषण
कर्तव्यों का रोपण
                                 "अनुपम आलोक "

मुक्तक मंथन 55 चित्र मुक्तक

नाव की तर्ज पर चल रही जिंदगी |
चांद की तर्ज पर ढ़ल रही जिंदगी |
हो जो ' मांझी अगर साथ विश्वास का,
बीच खुशियों के ' फिर पल रही जिंदगी |
                            (अनुपम आलोक )

मुक्तक मंच पदांत पर आधारित ..... समारोह -- 73

पदांत... नहीं आते
मेरी खुशियों को अब वह, नेह से ढ़कने नहीं आते |
मेरे जख्मों को सहलाने,,,,,,, मेरे अपने नहीं आते |
सजा तन्हाई की देकर,,, गया... मुसिंफ मेरा जबसे,
मेरी आँखों में अब,,,,,महबूब के.. सपने नहीं आते |
                                  { अनुपम आलोक }

Tuesday, June 30, 2015

मेरा सम्मान .....उन्नाव का सम्मान

विभिन्न मंचो पर मेरी कलम का हुआ सम्मान....

मेरा मानना .....मेरा आवाहन्

बहुत असहाय..किस्मत के..सताये हैं..यह बेचारे |
है मन्दिर के..कदमचों पर..पड़े जो..भूंख के मारे |
जिमा दोगे..निवाला इक, अगर इन..बेसहारों को ,
बिना मांगे..प्रभू देगें ..तुझे दुनिया के..सुख सारे |
                                   (अनुपम आलोक )

एक काव्यात्मक नजर उन्नाव की वैदिक,ऐतिहासिक,एवं साहित्यक पहचान पर .....

साहित्य... शौर्य... एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में.. मेरा उन्नाव.....

कविता का उदगम् हुआ जहाँ..साहित्य जहाँ की माटी है |
बलिदान राष्ट्र पर हो जाना..जिस जनपद की परिपाटी है |

भगवान राम के अनुवंशज "उतनाभ "नृपति की स्मृति यह |
उत +नाव..मनु -सतरूपा की..जल विप्लव काल में वर्णित यह |

श्रषि वाल्मीकि की पुण्य धरा..आधार ऊँ इस जनपद का |
गंगा, कल्याणी और सई..वन्दन करती हैं पग-पग का |

साहित्य, शौर्य और संस्कृति का..ध्वज अंबर तक फहराता है |
यह आदिकवि की तपो भूमि..लवकुश की शौर्य पताका है |

ममत्व, प्रेम और करूणा से.. अभिसिक्त यहाँ हर नाता है |
जिसको ईश्वर भी ठुकराये.. उसको भी गले लगाता है |

निर्वासित सीता ने आश्रय.. इस पुण्य धरा पर पाया था |
वनदेवी कह सम्मान दिया.. लव-कुश को गोद खिलाया था |

दिग्विजय राम की रूकी यहाँ.. बच्चों ने सबक सिखाया था |
अभिमान लखन का खण्डित कर.. जननी का कर्ज चुकाया था |

सीता के त्याग ,तपस्या का..परचम अंबर तक तना हुआ |
भूसुता समायी जिस भू में..जानकी कुण्ड वह बना हुआ |

अब भी श्रद्धा का साक्षी है.. वन देवी का कुशहरी स्वरूप |
हैं आदि शक्ति ही वनदेवी..लव-कुश को भाया यही रूप |

अज्ञातवाश में पांडव भी.. आश्रय इस रज में पाते हैं |
कल्याणी तट के पंच वीर.. अब पंच पीर कहलाते है |

अर्जुन के बांणो का साक्षी.. है सूर्य कुण्ड भी यहीं बना |
है विषय शोध का यह लेकिन.. देखो कब होता दीप्तवान |

यह मौरध्वज की तपो भूमि.. श्रवण समाधि का भी स्थल |
लव-कुश की क्रीड़ा भूमि यही.. जमदग्नि, परशु का तप स्थल |

इस रज के राजा सातन ने.. बढ़ता पग गौरी का कीला |
बारवहीं सदी की शोर्य कथा.. संचान कोट का वह टीला |

श्री मोहन सिंह, शिवसिंह सरोज, श्री सूर्य़कांत, सनेही जी |
यह काव्य गगन के अमर दीप.. जन्में हैं यहाँ हितैषी भी |

शिवरतन, चंद्रिका, राम बख्स ..यहाँ जसासिंह बलिदानी है |
जगदेवी का आजाद प्रखर...स्वर्णिम सी अमर कहानी है |

युग मानव वीर विश्वम्भर भी.. इस पावन रज की थाती हैं |
अब भी ज्योतिर्मय बनी हुई.. वह दिव्य ज्योति सी बाती है |

है क्षितिज आज भी गौरव का.. जनपद मेरा उन्नाव नाम |
साहित्य, शौर्य और श्रद्धा की.. इस पावन रज को है प्रणाम |
                            {अनुपम आलोक }
8858690656 #### 9795452084.
बाँगरमऊ (उन्नाव )

Sunday, June 28, 2015

मेरा उन्नाव

अपने जनपद की पहचान पर चार पंक्ति.....

जहां की सरजमी को सिर झुकाते मुल्क के ज्ञानी |
जहां की शख्शियत का है नहीं कोई फकत सानी |
शहीदों की चिताओं पर भी मेले जोड़ने वाला..
निराला और सुमन..आजाद है, उन्नाव का पानी |
                   (अनुपम आलोक )