Tuesday, June 30, 2015

मेरा सम्मान .....उन्नाव का सम्मान

विभिन्न मंचो पर मेरी कलम का हुआ सम्मान....

मेरा मानना .....मेरा आवाहन्

बहुत असहाय..किस्मत के..सताये हैं..यह बेचारे |
है मन्दिर के..कदमचों पर..पड़े जो..भूंख के मारे |
जिमा दोगे..निवाला इक, अगर इन..बेसहारों को ,
बिना मांगे..प्रभू देगें ..तुझे दुनिया के..सुख सारे |
                                   (अनुपम आलोक )

एक काव्यात्मक नजर उन्नाव की वैदिक,ऐतिहासिक,एवं साहित्यक पहचान पर .....

साहित्य... शौर्य... एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में.. मेरा उन्नाव.....

कविता का उदगम् हुआ जहाँ..साहित्य जहाँ की माटी है |
बलिदान राष्ट्र पर हो जाना..जिस जनपद की परिपाटी है |

भगवान राम के अनुवंशज "उतनाभ "नृपति की स्मृति यह |
उत +नाव..मनु -सतरूपा की..जल विप्लव काल में वर्णित यह |

श्रषि वाल्मीकि की पुण्य धरा..आधार ऊँ इस जनपद का |
गंगा, कल्याणी और सई..वन्दन करती हैं पग-पग का |

साहित्य, शौर्य और संस्कृति का..ध्वज अंबर तक फहराता है |
यह आदिकवि की तपो भूमि..लवकुश की शौर्य पताका है |

ममत्व, प्रेम और करूणा से.. अभिसिक्त यहाँ हर नाता है |
जिसको ईश्वर भी ठुकराये.. उसको भी गले लगाता है |

निर्वासित सीता ने आश्रय.. इस पुण्य धरा पर पाया था |
वनदेवी कह सम्मान दिया.. लव-कुश को गोद खिलाया था |

दिग्विजय राम की रूकी यहाँ.. बच्चों ने सबक सिखाया था |
अभिमान लखन का खण्डित कर.. जननी का कर्ज चुकाया था |

सीता के त्याग ,तपस्या का..परचम अंबर तक तना हुआ |
भूसुता समायी जिस भू में..जानकी कुण्ड वह बना हुआ |

अब भी श्रद्धा का साक्षी है.. वन देवी का कुशहरी स्वरूप |
हैं आदि शक्ति ही वनदेवी..लव-कुश को भाया यही रूप |

अज्ञातवाश में पांडव भी.. आश्रय इस रज में पाते हैं |
कल्याणी तट के पंच वीर.. अब पंच पीर कहलाते है |

अर्जुन के बांणो का साक्षी.. है सूर्य कुण्ड भी यहीं बना |
है विषय शोध का यह लेकिन.. देखो कब होता दीप्तवान |

यह मौरध्वज की तपो भूमि.. श्रवण समाधि का भी स्थल |
लव-कुश की क्रीड़ा भूमि यही.. जमदग्नि, परशु का तप स्थल |

इस रज के राजा सातन ने.. बढ़ता पग गौरी का कीला |
बारवहीं सदी की शोर्य कथा.. संचान कोट का वह टीला |

श्री मोहन सिंह, शिवसिंह सरोज, श्री सूर्य़कांत, सनेही जी |
यह काव्य गगन के अमर दीप.. जन्में हैं यहाँ हितैषी भी |

शिवरतन, चंद्रिका, राम बख्स ..यहाँ जसासिंह बलिदानी है |
जगदेवी का आजाद प्रखर...स्वर्णिम सी अमर कहानी है |

युग मानव वीर विश्वम्भर भी.. इस पावन रज की थाती हैं |
अब भी ज्योतिर्मय बनी हुई.. वह दिव्य ज्योति सी बाती है |

है क्षितिज आज भी गौरव का.. जनपद मेरा उन्नाव नाम |
साहित्य, शौर्य और श्रद्धा की.. इस पावन रज को है प्रणाम |
                            {अनुपम आलोक }
8858690656 #### 9795452084.
बाँगरमऊ (उन्नाव )

Sunday, June 28, 2015

मेरा उन्नाव

अपने जनपद की पहचान पर चार पंक्ति.....

जहां की सरजमी को सिर झुकाते मुल्क के ज्ञानी |
जहां की शख्शियत का है नहीं कोई फकत सानी |
शहीदों की चिताओं पर भी मेले जोड़ने वाला..
निराला और सुमन..आजाद है, उन्नाव का पानी |
                   (अनुपम आलोक )